✽कुलदेवी ✽दधिमथी माता✽
✽गोत्र✽ ✽अलदायण,अलवाण,अहिके,उदावत,कटलस,कपूरे,करोबटन,कलनह,काछवा,कुक्कस,खोर,माहरीवाल


दधिमथी का मंदिर नागौर जिले की जायल तहसील से 10 किलोमीटर दूर गोठ मांगलोद में है।दधिमन्थन से पैदा हुई दधिमती माता: दूध से होता है जिनका अभिषेक.पुराणों में 51 महाशक्ति पीठ व 26 उप पीठों का वर्णन मिलता है, इनको शक्ति पीठ या सिद्ध पीठ भी कहते हैं। इनमें से एक दधिमथी पीठ है, जो कपाल पीठ के नाम से भी जानी जाती है। सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाली त्रिनेत्रा भगवती, जो हाथों में चमकीला चक्र, तलवार, धनुष-बाण, अभय मुद्रा, कमल और त्रिशूल धारण किए हुए हैं, जो मोतियों के हार और कुण्डल से युक्त हैं, वह सिंह-वाहिनी वर देने वाली सर्वोत्कृष्टा पूजने योग्य दधिमथी माता सदा मंगल करे।दधिर्भक्त जनान धात्री मथी तदरिमाथिनी।देवी दधिमथी नाम धन्वदेशे विराजते।।त्रेता युग में अयोध्यापति राजा मान्धाता ने यहां एक सात्विक यज्ञ किया। उस समय माघ शुक्ला सप्तमी थी, देवी प्रकट हुई, जो दधिमथी के नाम से जानी जाती है। शिलालेख उके अनुसार इसका निर्माण गुप्त सम्वत् 289 को हुआ, जो करीब 1300 वर्षों पूर्व मंदिर शिखर का निर्माण हुआ। सम्वत 608 में 14 दाधीच ब्राह्मणों द्वारा 2024 तत्कालीन स्वर्ण-मुद्राओं से इसका गर्भग1ह व 38 स्तम्भों का निर्माण हुआ।इतिहास-विशेषज्ञों व पुरातत्व विभाग ने इस मंदिर को लगभग 2000 वर्ष प्राचीन माना है। 1908 के शिलालेख के अनुसार दाधीच-कुलभूषण सिद्व-ब्रह्मचारी बुढादेवल निवासी श्री विष्णुदास जी महाराज की आज्ञा से उदयपुर राजा स्वरूपसिंह जी ने चौक व तिबारे, दरवाजे, यात्री-निवास, बावड़ी, मंदिर आदि का निर्माण करवाया।देवी के वर्तमान मंदिर की मूर्ति के बारे में कहते हैं कि जब देवी प्रकट हो रही थी, तभी वहां ग्वाला गाय चरा रहा था, जमीन के फटने से वहां गर्जना हुई। उसी के साथ देवी का कपाल बाहर निकला, गाएं भागने लगी तब ग्वाला ने कहा- माता ढबजा। उसके कहने से भगवती का कपाल ही बाहर आया। उस समय गायों के दूध से उसका अभिषेक किया गया। आज भी पूरे भारत में यह दधिमथी माता का एक ही मंदिर है, जहां दूध से अभिषेक होता है।
✽आरती✽
जय जय जनक सुनन्दिनि, हरि वनन्दिनि हे । दुष्ट निकन्दिनि मात, जय जय विष्णु प्रिये ॥सकल मनोरथ दोहिनी, जग सोहिनी हे । पशुपति मोहिनी मात, जय जय विष्णु प्रिये ॥विकट निशाचर कुन्थिनि, दधिमन्थिनि हे । त्रिभुवन ग्रन्थिनी मात, जय जय विष्णु प्रिये ॥दिवानाथ सम भासिनी, सुख हासिनि हे । मरुधर वासिनि मात, जय जय विष्णु प्रिये ॥जग्दम्बे जय कारिणि, खल हारिणि हे । म्रगरिपु चारिणि मात, जय जय विष्णु प्रिये ॥पिप्प्लाद मुनि पालिनी, वपु शालिनि हे । खल दल दालिनि मात, जय जय विष्णु प्रिये ॥तेज विजित सौदामिनि, हरि भामिनि हे । अयि गज गामिनि मात, जय जय विष्णु प्रिये ॥ .धरणी धर सुसहायिनि, श्रुति गायिनि हे । वांछित दायिनि मात, जय जय विष्नु प्रिये ॥
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