स्वर्णकार महाभारत श्लोक

               

 ✽ महाभारत शान्ति पर्व अध्याय 49 श्लोक ✽

✽श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को त्रेतायुग की बात बताते हैं✽

✽मुख्य सार✽


श्री कृष्ण बताते है- हे राजन जब परशुराम ने अपने पिता की हत्या के क्रोद्ध में पुरी पृथ्वी को क्षत्रियों से विहीन करने की प्रतिज्ञा लेकर हथियार उठाया तो क्षत्राणियो के गर्भ तक के क्षत्रियों को भी नही छोड़ा कुछ क्षत्रिय जंगलो और जानवरों के बीच जीवित रहे परशुराम ने क्षत्रियों का विनाश कर जंगलो में तपस्या के लिए निकल गए कई हजार वर्षो की तपस्या के बाद  वापस आए तो क्षत्रिय हजारो में फिर बढ़ गए एसा देख परशुराम जी को फिर क्रोद्ध आया और  हथियार उठा लिए और क्षत्रिय का पृथ्वी पर विनाश कर दिया  फिर कश्यपजी ने परशुराम से कहा मुनिवर अब चले जाए यहाँ से फिर अब कभी यहाँ मत आना और  परशुराम वापस तपस्या के लिए निकल गए कुछ क्षत्रिय सदा शिल्पी और सुनार आदि जातियों के आश्रित होकर रहते थे वो बच्च गये क्षत्रियों के बिना पृथ्वी पर आत्याचार बढ़ने लगे तो पृथ्वी दुखी हुई और कश्यपजी से कहा जो क्षत्रिय बच्चा लिए हैं वो सभी क्षत्रिय बालक जहाँ-तहाँ विख्यात हैं।उन सब पराक्रमी क्षत्रिय भूपालों को बुलाकर कश्यपजी ने उनका भिन्न-भिन्न राज्यों पर अभिषेक कर दिया। उन्हीं के पुत्र-पौत्र बढे़, जिनके वंश इस समय प्रतिष्ठित हैं।  पाण्डुनन्दन !तुमने जिसके विषय में मुझसे पूछा था, वह पुरातन वृतांत ऐसा ही हैं। युधिष्ठिर और श्रीकृष्ण इस प्रकार बातचीत करते हूए उस स्थान जा पहुँचे, जहाँ प्रभावशाली गंगानन्दन भीष्म बाणशय्या पर सोये हुए थे।

 श्लोक 49 ✽


सम्पूर्ण विद्याओं तथा धनुर्वेद के पारंगत विद्वान प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी क्षत्रियहन्ता परशुरामजी है। परशुरामजी ने गन्धमादन पर्वत पर महादेव जी को संतुष्ट करके उनसे अनेक प्रकार के अस्त्र और अत्यन्त तेजस्वी कुठार प्राप्त किये। उस कुठार की धार कभी कुण्ठित नहीं होती थीं। वह जलती हुई आग के समान उद्दीप्त दिखायी देता था। उस अप्रमेय शक्तिशाली कुठार के कारण परशुरामजी सम्पूर्ण लोकों में अप्रतिम वीर हो गये। इसी समय राजा कृतवीर्य का बलवान पुत्र अर्जुन हैहयवश्ं का राजा हुआ, जो एक तेजस्वी क्षत्रिय था। दत्तात्रेयजी की कृपा से राजा अर्जुन ने एक हजार भुजाएँ प्राप्त की थीं। वह महातेजस्वी चक्रवर्ती नरेश था। उस परम धर्मज्ञ नरेश ने अपने बाहुबल से पर्वतों और द्वीपों सहित इस सम्पूर्ण पृथ्वी को युद्ध में जीतकर अश्वमेध यज्ञ में ब्राह्मणों को दान कर दिया था। कुन्तीनन्दन! एक समय भूखे-प्यासे हुए अग्निदेव ने पराक्रमी सहस्रबाहु अर्जुन से भिक्षा माँगी और अर्जुन ने अग्नि को वह भिक्षा दे दी। तत्पश्चात् बलशाली अग्निदेव कार्तवीर्य अर्जुन के बाणों के अग्रभाग से गाँवों, गोष्ठों, नगरों और राष्ट्रों को भस्म कर डालने की इच्छा से प्रज्वलित हो उठे। उन्होंने उस महापराक्रमी नरेश कार्तवीर्य के प्रभाव से पर्वतों और वनस्पतियों को जलाना आरम्भ किया। हवा का सहारा पाकर उत्तरोत्तर प्रज्वलित होते हुए अग्निदेव ने हैहयराज को साथ लेकर महात्मा आपव के सूने एवं सुरम्य आश्रम को जलाकर भस्म कर दिया।महाबाहु अच्युत! कार्तवीर्य के द्वारा अपने आश्रम के जला दिये जाने पर शक्तिशाली आपव मुनि को बडा रोष हुआ। उन्होंने कृतवीर्य पुत्र अर्जुन को शाप देते हुए कहा। अर्जुन! तुमने मेरे इस विशाल वन को भी जलाये बिना नहीं छोडा, इसलिये संग्राम में तुम्हारी इन भुजाओं को परशुराम जी काट डालेंगे। भारत !अर्जुन महातेजस्वी, बलवान, नित्य शान्ति परायण, ब्राह्मण भक्त शरणागतों को शरण देने वाला, दानी और शूरवीर था। अतः उसने उस समय उनम महात्मा के दिये हुए शाप पर कोई ध्यान नहीं दिया। शापवश उसके बलवान पुत्र ही पिता के वध में कारण बन गये। भरतश्रेष्ठ !उस शाप के कारण सदा क्रूरकर्म करने वाले वे घमंडी राजकुमार एक दिन जमदग्नि मुनि की होमधेनु के बछडे को चुरा ले आये। उस बछडे के लाये जाने की बात बुद्धिमान हैहयराज कार्तवीर्य को मालूम नहीं थी,
तथापि उसी के लिये महात्मा परशुराम का उसके साथ घोर युद्ध छिड गया।राजेन्द्र! तब रोष में भरे हुए प्रभावशाली जमदग्निनन्दन परशुराम ने अर्जुन की उन भुजाओं को काट डाला और उस बछडे को 
लेकर अपने आश्रम में ले आये। नरेश्वर! अर्जुन के पुत्र बुद्धिहीन और मुर्ख थे।उन्होंने संगठित हो महात्मा जगदग्नि के आश्रम पर जाकर भल्लों के अग्रभाग से उनके मस्तक को धड से काट गिराया। उस समय यशस्वी परशुरामजी समिधा और कुशा लाने के लिये आश्रम से दूर चले गये थे। पिता के इस प्रकार मारे जाने से परशुराम के क्रोध की सीमा न रही। उन्होंने इस पृथ्वी को क्षत्रियों से सूनी कर देने की भीष्म प्रतिज्ञा करके हथियार उठा लिया।भृगुकुल के सिंह पराक्रमी परशुराम ने सहस्त्रों हैहयों का वध करके इस पृथ्वी पर रक्त की कीच मचा दी।
इस प्रकार शीघ्र ही पृथ्वी को क्षत्रियों से हीन करके महातेजस्वी परशुराम अत्यन्त दया से द्रवित हो वन में ही चले गये।तदनन्तर कई हजार वर्ष बीत जाने पर एक दिन वहाँ स्वभावतः 

क्रोधी परशुराम पर आक्षेप किया गया। महाराज ! विश्वामित्र के पौत्र तथा रैभ्य के पुत्र महातेजस्वी परावसु ने भरी सभा में आक्षेप करते हुए कहा- राम ! राजा ययाति के स्वर्ग से गिरने के समय जो प्रतर्दन आदि सज्जन पुरूष यज्ञ में एकत्र हुए थे, क्या वे क्षत्रिय नहीं थे? तुम्हारी प्रतिज्ञा झूठी है। तुम व्यर्थ ही जनता की सभा में डींग हाँका करते हो कि मैंने क्षत्रियों का अन्त कर दिया। मैं तो समझता हूँ कि तुमने क्षत्रिय वीरों के भय से ही पर्वत की शरण ली है। इस समय पृथ्वी पर सब और पुनः सैकडों क्षत्रिय भर गये है। राजन् ! परावसु की बात सुनकर भृगुवंशी परशुराम ने पुनः शस्त्र उठा लिया।पहले उन्होंने जिन सैकडों क्षत्रियों को छोड दिया था, वे ही बढकर महापराक्रमी भूपाल बन बैठे थे। नरेश्वर ! उन्होंने पुनः उन सबके छोटे छोटे बच्चों तक को शीघ्र ही मार डाला। जो बच्चे गर्भ में रह गये थे, उन्हीं से पुनः यह सारी पृथ्वी व्याप्त हो गयी। परशुरामजी एक एक गर्भ के उत्पन्न होने पर पुनः उसका वध कर डालते थे। उस समय क्षत्राणियाँ कुछ ही पुत्रों को बचा सकी थी। राजन्! तदनन्तर कुछ क्षत्रियों को बचाये रखने की इच्छा से कश्यपजी ने स्त्रुक लिये हुए हाथ से संकेत करते हुए यह बात कही- महामुने! अब तुम दक्षिण समुद्र के तट पर चले जाओ। अब कभी मेरे राज्य में निवास न करना।यह सुनकर परशुरामजी चले गये समुद्र ने सहसा जमदग्निकुमार परशुराम जी के लिये जगह खाली करके शूर्पारक देश का निर्माण किया; जिसे अपरान्त भूमि भी कहते है। महाराज ! कश्यप ने पृथ्वी को दान में लेकर उसे ब्राह्मणों के अधीन कर दिया और वे स्वयं विशाल वन के भीतर चले गये। भरतश्रेष्ठ !फिरतो स्वेच्छाचारी वैश्य और शूद्र श्रेष्ठ द्विजों की स्त्रियों के साथ अनाचार करने लगे। सारे जीवनजगत में अराजकता फैल गयी। बलवान मनुष्य दुर्बलों को पीडा देने लगे। उस समय ब्राह्मणों में से किसी की प्रभुता कायम न रही। कालक्रम से दुरात्मा मनुष्य अपने अत्याचारों से पृथ्वी को पीडित करने लगे। इस उलट फेर से पृथ्वी शीघ्र ही रसातल में प्रवेश करनेलगी; क्योंकि उस समय धर्मरक्षक क्षत्रियों द्वारा विधिपूर्वक पृथ्वी की रक्षा नहीं की जा रही थी। भय के मारे पृथ्वी को रसातल की ओर भागती देख महामनस्वी कश्यप ने अपने ऊरूओं का सहारा देकर उसे रोक दिया। कश्यपजी ने ऊरू से इस पृथ्वी को धारण किया था; इसलिये यह उर्वी नाम से प्रसिद्ध हुई। उस समय पृथ्वी देवी ने कश्यपजी को प्रसन्न 
करके अपनी रक्षा के लिये यह वर माँगा कि मुझे भूपाल दीजिये।






श्रीकृष्ण कहते हैं-राजन्! तदनन्तर पृथ्वी के बताये हुए उन सब पराक्रमी क्षत्रिय भूपालों को बुलाकर कश्यपजी ने उनका भिन्न-भिन्न राज्यों पर अभिषेक कर दिया। उन्हीं के पुत्र-पौत्र बढे़, जिनके वंश इस समय प्रतिष्ठित हैं। पाण्डुनन्दन !तुमने जिसके विषय में मुझसे पूछा था, वह पुरातन वृतांत ऐसा ही हैं।वैशम्पायन जी कहते हैं-राजन्! धर्मात्माओं में श्रेष्ठ युधिष्ठिर से इस प्रकार वार्तालाप करते हुए यदुकुल-तिलक महात्मा श्रीकृष्ण उस रथ के द्वारा भगवान सूर्य के समान सम्पूर्ण दिशाओं में प्रकाश फैलाते हुए शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़ते चले गयें।वैशम्पायन जी कहते हैं- राजन्! परशुराम जी का वह अलौकिक कर्म सुनकर राजा युधिष्ठिर बड़ा को आश्चर्य हुआ। वे भगवान श्रीकृष्ण से बोले-। ‘वृष्णिनन्दन! महात्मा परशुराम का पराक्रम तो इन्द्र के समान अत्यन्त अद्ध्रुत है, जिन्होंने क्रोध करके यह सारी पृथ्वी क्षत्रियों से सूनी कर दी। क्षत्रियों के कुल का भार वहन करने वाले श्रेष्ठ पुरुष परशुरामजी के भय से उद्विग्न हो छिपे हुए थे और गाय, समुंद्र, लंगूर, रीछ तथा वानरों द्वारा उनकी रक्षा हुई थी। ’अहो! यह मनुष्यलोक धन्य है और इस भूतल के मनुष्य बड़े भाग्यवान् हैं, जहाँ द्विजवर परशुरामजी ने ऐसा धर्मसंगत कार्य किया। तात! युधिष्ठिर और श्रीकृष्ण इस प्रकार बातचीत करते हूए उस स्थान जा पहुँचे, जहाँ प्रभावशाली गंगानन्दन भीष्म बाणशय्या पर सोये हुए थे।शापवश उसके बलवान पुत्र ही पिता के वध में कारण बन गये।भरतश्रेष्ठ !उस शाप के कारण सदा क्रूरकर्म करने वाले थे वे घमंडी राजकुमार एक दिन जमदग्नि मुनि की कामधेनु के बछडे को चुरा ले आये।भारत !अर्जुन महातेजस्वी, बलवान, नित्य शान्ति परायण, ब्राह्मण भक्त शरणागतों को शरण देने वाला,दानी और शूरवीर था।अतः उसने उस समय उनम महात्मा के दिये हुए शाप पर कोई ध्यान नहीं दिया। पृथ्वी बोली- ब्राह्मण! मैंने स्त्रियों में कई क्षत्रियशिरोमणियों को छिपा रखा है। मुने! वे सब हैहयकुल में उत्पन्न हुए है, जो मेरी रक्षा कर सकते है। प्रभो ! उनके सिवा पुरूवंशी विदूरथ का भी एक पुत्र जीवित है, जिसे ऋक्षवान् पर्वत पर रीछों ने पालकर बडा किया है। इसी प्रकार अमित शक्तिशाली यज्ञपरायण महर्षि पराशर ने दयावश सौदास के पुत्र की जान बचायी है, वह राजकुमार द्विज होकर भी शूद्रों के समान सब कर्म करता है, इसलिये सर्वकर्मा नाम से विख्यात है। वह राजा होकर मेरी रक्षा करे। राजा शिबिका एक महातेजस्वी पुत्र बचा हुआ है, जिसका नाम है गोपति। उसे वन में गौओं ने पाल पोसकर बडा किया है। मुने ! आपकी आज्ञा हो तो वही मेरी रक्षा करे। प्रतर्दनका महाबली पुत्र वत्स भी राजा होकर मेरी रक्षा कर सकता है। उसे गोशाला में बछडों ने पाला था, इसलिये उसका नाम वत्स हुआ है। दधिवाहन का पौत्र और दिविरथ का पुत्र भी गंगातट पर महर्षि गौतम के द्वारा सुरक्षित है। महातेजस्वी महाभाग बृहद्रथ महान ऐश्वर्य से सम्पन्न है। उसे गृध्रकूट पर्वत पर लंगूरों ने बचाया था। राजा मरूत के वंश में भी कई क्षत्रिय बालक सुरक्षित है, जिनकी रक्षा समुद्र ने की है। उन सबका पराक्रम देवराज इन्द्र के तुल्य है। ये सभी क्षत्रिय बालक जहाँ-तहाँ विख्यात है। वे सदा शिल्पी और स्वर्णकार आदि जातियों के आश्रित होकर रहते है। यदि वे क्षत्रिय मेरी रक्षा करें तो मैं अविचल भाव से स्थिर हो सकूँगी। इन बेचारों के बाप दादे मेरे ही लिये युद्ध अनायास ही महान् कर्म करने वाले परशुरामजी के द्वारा मारे गये है। महामुने! मुझे उन राजाओं से उऋण होने के लिये उनके इन वंशजों का सत्कार करना चाहिये। मै धर्म की मर्यादा को लाँघने वाले क्षत्रिय के द्वारा कदापि अपनी रक्षा नहीं चाहती। जो अपने धर्म में स्थित हो, उसी के संरक्षण में रहूँ, यही मेरी इच्छा है; अतः आप इसकी शीघ्र व्यवस्था करें।


✽महाभारत शान्ति पर्व अध्याय 49 श्लोक✽

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